कार्तिक के छठे दिन,
हम सभी चले नदी की तरफ ,
या फिर किसी तालाब की ओर!
काफिला कुछ ऐसा बनाये,
जिसमे हो सभी शामिल!
आदमी उठाये सर पर 'दौरा',
कुछ अपने को नापते हुए,
ज़मीन पर लकरियां खीचें,
कुछ बस बच्चों के साथ मस्तियाँ लुटें!
औरतें गाते हुए गीत,
करके नहाय खाय और खरना,
जल में उतरकर करे अराधना,
अरघ चढ़ाये भक्ति के साथ,
सोते हुए हुए सूरज की!
फिर डरते नहीं अंधेरों से,
उमँग ही उमँग हर चेहरे पर,
फिर हो कुछ ऐसा माहौल
चारो तरफ बस हल्ला-गुला,
मंत्रो का कुछ ऐसा असर,
रात में 'कोसी' जलें ,
पांच तत्वों का होवे मिलन!
जागे फिर सूरज सुबह को,
औरंतें चढ़ाये एक और अरघ।
प्राथना येही की सूरज,
हर साल बस ऐसी ही उजाला,
लाये हम सब की जिंदगी में!
फिर हम सब खाए ठेकुआ,
बहुत खीर और पुरियां !
ले मजे फिर केलों का,
गन्नो से निकाले रस,
मुंह तो मीठा होवे ,
मन भी ऐसा होए!
हम सब फिर करें कामना,
जब आए अगला कार्तिक,
छठे दिन फिर हम करें छठ !
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