Thursday, November 1, 2012

एक कहानी

एक था राजा एक थी रानी,
दोनों की थी कुछ ऐसी कहानी,
राजा था बस  सीधा साधा,
रानी के कहने पे चलता बिना बाधा,
पर रानी थी एक चतुर सैयानी,
करती हमेशा अपनी मनमानी,
राजा को थी चिंता प्रजा की,
सोचता हमेशा उनकी भलाई की,
लेकिन वह कुछ कह नहीं पाता,
चाह कर  भी कुछ कर नहीं पाता,
रानी के थे कुछ ऐसे शिकंजे,
चारो तरफ थे उसके ही बन्दे,
मचा राखी थी उन लोगों ने लुट मार,
प्रजा के सामने बस होती राजा की ही हार,
बस राजा इस उधेर बुन में रहता,
काश रानी को किसी तरह बस रोक पाता,
बीते दिन- महीने और बहुत सारे साल,
चुप रहा राजा लेकर मन में यही मलाल,
काश ना की होती ऐशी शादी,
जिसमें थी  प्रजा और उसकी  दोनों की बर्बादी,
बस होते रहे सारे वो लोग आबाद,
जो थे अन्दर से कुछ  ऐसे जल्लाद,
सबके सामने वे बस खून करते रहते,
राज के नाम पर बस बचते रहते,
प्रजा से उनको  ना ही था कोई लगाव,
यह मंजर फिर लाया कुछ ऐसा सैलाब,
बह गए सारे और उनके साथ बेचारा राजा भी,
पर आया न दाग रानी पर एक फिर भी, 
और ना ही परी उसको कुछ चुकानी,
क्योंकि रानी जो थी कुछ ऐसी सैयानी!

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