Tuesday, January 22, 2013

निर्भय

दिल्ली में अब हैं भय
और सिर्फ है भय 
मत बन तू अब निडर 
अगर हैं शाम या है फिर रात 
लौट जा अपने घर के अन्दर 
क्योंकि है दरिंदे चारो ओर 
जिन्होंने क़त्ल किया निर्भय का 
बेदर्दी और बेरहमी से 
वास कराया है भय का 
डर से तू डर और डर- डर के तू जी 
दिल में हर पल तू रख डर
ग़र कम हो जाए फिर डर
ले तू दिल्ली से उधार
क्योंकि दिल्ली में अब है डेरा
सिर्फ भय और डर का
अब न रहता वहां कोई
निर्भय, निर्भय, निर्भय ! 

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